बलौदा बाज़ार का इतिहास: महानदी, शिवनाथ तथा जोंक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में बसे बलौदा बाज़ार की सीमाएं बेमेतरा, मुंगेली, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़, महासमुंद व रायपुर जिले को स्पर्श करती है। जनश्रुति के अनुसार पुराने ज़माने में यहाँ हरियाणा, महाराष्ट्र, ओड़िसा, बरार आदि प्रांतों से व्यापारी बैल-भैंसा (बोदा) खरीदने नगर के भैंसा पसरा में एकत्र होते थे। परिणास्वरूप इस क्षेत्र का नाम बैलबोदा बाज़ार और कालांतर में बलौदा बाज़ार हो गया।
अंग्रेजों के शासनकाल में सन् 1854 से सन् 1864 तक बलौदा बाज़ार व तरेंगा (भाटापारा) रायपुर जिले का अंग था। सन् 1864 के बाद इन इलाकों को बिलासपुर जिले में शामिल कर लिया गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से आ रही दिक्कतों को देखते हुए सन् 1903 में सिमगा स्थित तहसील मुख्यालय को बलौदा बाज़ार में स्थानान्तरित कर इसे जिले का दर्जा दिया गया। उस समय विकासखण्ड सिमगा, भाटापारा, पलारी, कसडोल व बिलाईगढ़ बलौदा बाज़ार के अंतर्गत आ गए। सन् 1920 में सेनीटेशन एक्ट लागू हुआ तथा बलौदा बाज़ार में पंचायत का गठन किया गया।
बलौदा बाजार का इतिहास और प्रमुख पर्यटन स्थल- नेचर सफ़ारी, सोनबरसा | Nature Safari, Sonbarsa
- सिद्धखोल l Siddhakhol
- शिव मन्दिर, नारायणपुर l Shiv Mandir, Narayanpur
- बालसमुंद जलाशय, पलारी l Balsamund Jalashay, Palaree
- सिद्धेश्वर मन्दिर, पलारी l Siddheshwar Mandir, Palaree
- डमरू l Damroo
- देवरीग्राम l Devreegram
- बगदई देवी मंदिर एवं बाँध l Bagadae Devee Mandir & Bandh
- धमनी l Dhamnee
- मावली माता मंदिर, सिंगारपुर l Mavlee Mata Mandir, Singarpur
- मावली देवी मन्दिर, तरपोंगा l Mavlee Mata Mandir, Tarponga
- बल्लार बाँध l Ballar Bandh
- वीर नारायण सिंह स्मारक, सोनाखान l Veer Narayan Singh Smark, Sonakhan
- सेंट इम्मानुएल चर्च, विश्रामपुर l Center Immanuel Church, Vishrampur
- राजमहल, बिलाईगढ़ l Rajmahal, Bilaigarh
- बारनवापारा अभयारण्य l Barnavapara Sanctuary
- तेलीधारा l Teleedhara
1. नेचर सफ़ारी, सोनबरसा | Nature Safari, Sonbarsa
जिला मुख्यालय से लगभग 3 कि.मी. दूर ग्राम पंचायत लटुआ स्थित सोनबरसा रिजर्व फ़ॉरेस्ट को वर्ष 2018 में नेचर सफ़ारी के रूप में विकसित किया गया है। सोनबरसा जंगल 890 हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह जंगल चारों तरफ से मजबूत जालियों से घिरा हुआ है। इसके अलावा इन्हें दीवारों से भी घेर दिया गया है। इस जंगल में खरोगश, हिरण, जंगली सूअर, भेड़िया, नेवला कई दुर्लभ प्रजाति की बिल्लियाँ देखी जा सकती हैं।
जंगल के भीतर स्थित तालाबों के पास पक्षियों के बैठने व दाना-पानी की व्यवस्था की गई है ताकि वे यहाँ अपना ठिकाना बना सकें। इसके अलावा यहाँ डियर पार्क का भी निर्माण करवाया जा रहा है। पर्यटक वन विभाग की जिप्सी द्वारा या साइकिल द्वारा भ्रमण का लुत्फ़ उठा सकते हैं। पर्यटकों की सुविधा के लिए कैफे के अलावा विश्रामगृह की भी व्यवस्था है।
2. सिद्धखोल l Siddhakhol
जिला मुख्यालय से लगभग 10 कि.मी. दूर स्थित कसडोल तहसील के पिथौरा मार्ग पर सोनाखान वन परिक्षेत्र के भीतर यह खूबसूरत जलप्रपात स्थित है। इसे स्थानीय निवासी शीत बाबा या सिद्ध बाबा भी कहते हैं। सिद्ध बाबा वास्तव में एक घाटी है, जहाँ लगभग 40 फ़ीट की ऊँचाई से जलधारा खाई में गिरती है। यह मिश्रित वनों से घिरा हुआ है। जलप्रपात के पास ही सिद्धबाबा का मन्दिर है, जहाँ लोग दर्शन करते है, एवं पिकनिक मनाने के लिए पिथौरा एवं कसडोल से इस स्थान पर आते है।
इस जलप्रपात के ऊपर स्टॉप डैम बना दिया गया है तथा कुछ दूर आगे जाने पर पुल जैसा मार्ग बना दिया है, जिससे इस जलप्रपात की अविरल धारा प्रभावित हो गई है। सैलानियों की सुरक्षा के लिए जलप्रपात के आसपास घेरा बना दिया गया है। इसके अलावा जंगलों के विहंगम दृश्य को देखने के लिए झरने के सामने वॉच टॉवर का निर्माण किया गया है।
3. शिव मन्दिर, नारायणपुर l Shiv Mandir, Narayanpur
यह मन्दिर जिला मुख्यालय से लगभग 8 कि.मी. दूर सिरपुर मार्ग पर कसडोल तहसील के टेमरी ग्राम पंचायत के नारायणपुर ग्राम में स्थित है। यह बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसके तीनों अंग गर्भगृह, अंतराल तथा मण्डप सुरक्षित हैं। भित्तियों पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। तत्कालीन परम्परानुसार कुछ मिथुन प्रतिमाएं भी हैं। इसके अलावा भित्तियों पर सांप और नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन है।
मंदिर के एक कक्ष में कई प्राचीन भग्न प्रतिमाएं रखी हुई हैं। यह छत्तीसगढ़ के अल्पज्ञात मंदिरों में से एक है। इसके बारे में स्थानीय निवासियों के अलावा कुछ पुरातत्ववेत्ता को ही जानकारी है। बाहर के सैलानी यहाँ तक कम ही पहुँच पाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस मन्दिर का निर्माणकाल 10वीं- 11वीं शताब्दी है। खरौद में पाए गए 1181 ईस्वी के एक शिलालेख में उल्लेख है, कि यहाँ हैहयवंशी राजाओं द्वारा भव्य उद्यान का निर्माण करवाया गया था।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण रात में ही किया गया एवं निर्माण कार्य 6 माह में पूर्ण हुआ था। जनश्रुति के अनुसार इसका निर्माण नारायण नामक शिल्पी ने किया था। इस मंदिर के कंगूरे पर कलश स्थापित नहीं है। इससे सम्बंधित जनश्रुति है, कि नारायण शिल्पी रात्रि के समय निर्वस्त्र होकर काम करता था। एक बार उसकी बहन भोजन लेकर आ गई तथा भाई को निर्वस्त्र देख लिया।
लज्जावश शिल्पकार ने मन्दिर के कंगूरे से कूदकर अपनी जान दे दी तथा भाई के दुख में बहन भी तालाब में कूद गई। आज भी इस मन्दिर में भाई-बहन एक साथ नहीं जाते। नारायण शिल्पी को अपना पूर्वज मानने वाले कंवर (पैकरा समुदाय) द्वारा यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक त्रिदिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें बलौदा बाजार, रायपुर, महासमुंद, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा एवं रायगढ़ जिले के कंवर समाज के लोग आते हैं। इस मेले में आदिवासी संस्कृति से जुड़े अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
4. बालसमुंद जलाशय, पलारी l Balsamund Jalashay, Palaree
यह छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े जलाशयों में से एक है। यह 110 एकड़ में फैला हुआ है। इस वृताकार जलाशय के मध्य में एक छोटा सा टापू है, जो तीन एकड़ में फैला हुआ है। यहाँ शारदा देवी का मन्दिर स्थापित है। स्थानीय निवासियों के लिए यह टापू सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का मुख्य केन्द्र माना जाता है। इसके तट पर अनेक मन्दिर निर्मित है। टापू तथा इसके उत्तर-पूर्व में बलुआ पत्थर से घाट बने हुए हैं ।
जनश्रुति के अनुसार इस तालाब का निर्माण छैमासी रात में घुमंतु जाति के नायकों द्वारा किया गया था, जो नमक का व्यापार करते थे । तालाब बन जाने के बाद भी जब इसमें पानी नहीं आया तो उन्होंने अपने नवजात शिशु को परात में रखकर यहाँ छोड़ दिया। इसके बाद यह तालाब पानी से भर गया और शिशु भी परात सहित बहकर किनारे आ गया। इसलिए इस जलाशय को बालसमुंद कहा जाता है।
5. सिद्धेश्वर मन्दिर, पलारी l Siddheshwar Mandir, Palaree
जिला मुख्यालय से लगभग 15 कि.मी. दूर बलौदा बाज़ार रोड पर स्थित पलारी गाँव में विशाल बालसमुंद जलाशय के तट पर स्थापित सिद्धेश्वर मंदिर का निर्माण लगभग 7वीं - 8वीं शताब्दी में किया गया था। ईंटों से निर्मित यह मन्दिर पश्चिमाभिमुखी है। द्वार पर गंगा और यमुना त्रिभंग मुद्रा में चित्रित हैं। द्वार के शीर्ष पर त्रिदेव का अंकन है। साथ ही, शिव विवाह का सुन्दर दृश्य चित्रित है। द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का चित्रण है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। शिखर पर कीर्तिमुख, गजमुख और व्याल की आकृति बनी हुई है, जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार 1950-60 में यह मंदिर ध्वस्त होने की कगार पर था। तब पलारी के मालगुजार इसका जीर्णोद्धार करवाना चाहते थे। परन्तु ऐसा हो न सका। पुनः उनके पुत्र ब्रजलाल वर्मा (भू.पू. केंद्रीय मंदिर) ने 1960- 61 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया ।
6. डमरू l Damroo
ग्राम डमरू जिला मुख्यालय से लगभग 17 कि.मी. दूर शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है। इस ग्राम में प्राचीन मृत्तिका दुर्ग प्राप्त हुए हैं। यहाँ उत्खनन के परिणामस्वरूप लगभग 4थी - 5वीं शताब्दी ई. के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इन पुरावशेषों में मुख्य रूप से गुप्तकालीन/सोमवंशी अवशेषों के अतिरिक्त प्राचीन भवन संरचना और बौद्ध स्तूप प्राप्त हुए हैं।
- स्तूपः इस गाँव में खुदाई के दौरान पहली बार बौद्ध धर्म से जुड़े एक मुख्य स्तूप और 14 अन्य मनौती स्तूप (वोटिव स्तूप) मिले हैं। इन वृत्ताकार संरचनाओं के आधार पर पुरातत्ववेत्ताओं का दावा है, कि डमरू सबसे बड़ा प्राचीन बौद्ध स्थल साबित हो सकता है। यहाँ 6 स्तूप आपस में मिले हुए हैं। इनके बीच आने-जाने का रास्ता भी बना हुआ है। पुरातत्वविदों के अनुसार ये स्तूप 15 सौ से 2 हज़ार वर्ष पुराने हैं।
- चरण चिन्ह: डमरू में पहली बार बुद्ध के चरण चिन्ह प्राप्त हुए हैं। गोलाकार प्रस्तर पर बोधिवृक्ष की बारह पत्तियों के बीच भगवान बुद्ध के पदचिन्हों को उकेरा गया है। दोनों पदचिन्हों के दोनों पार्श्व में मछलियों का कलात्मक अंकन है। पदचिन्हों के निचले भाग में प्रतीकात्मक रूप से धर्मचक्र उत्कीर्ण है। दोनों बाजुओं में उकेरी गई मछलियाँ और धर्मचक्र मिलकर अंग्रेजी के डब्ल्यू अक्षर का आकार बनाते हैं, जिसे त्रिरत्न चिन्ह कहा जाता है ।
- प्राचीन शिव मन्दिरः यह शिव मन्दिर गाँव के बाहर प्रस्तर निर्मित चबूतरे पर स्थित है। इस पूर्वाभिमुखी जर्जर मन्दिर में आमलक नहीं है और गर्भगृह रिक्त है। सिरविहीन नन्दी मन्दिर के पीछे एवं जलधारी (योनिपीठ) मन्दिर के सामने रखे हैं। इसके अतिरिक्त इस परिसर में दो लघु टीले हैं। पूर्व में इस स्थल से प्राप्त प्राचीन प्रतिमाओं को परिसर में ही नवनिर्मित महामाया मन्दिर की भित्तियों में जड़ दिया गया है। उक्त प्राचीन मन्दिर कलचुरीकालीन (काल लगभग 12वीं शती ईस्वी) है, जो समकालीन वास्तु शिल्प एवं मूर्तिकला का सुंदर उदाहरण है।
7. देवरीग्राम l Devreegram
जिला मुख्यालय से लगभग 15 कि.मी. दूर ग्राम पंचायत देवरी महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां से मध्य तथा उच्च पुरापाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ जमुनिया नदी की दोनों धाराओं के संगम के निकट से आदिमानवों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले पत्थर के कई औजार भी मिले हैं। इससे पूर्व यहाँ हुए उत्खनन में दो शिव मन्दिरों व इनके ठीक दक्षिण में वर्गाकार ईंट निर्मित संरचना प्राप्त हुई है। इन मन्दिरों को चारों ओर से घेरे हुए लगभग एक मीटर चौड़ी भित्ति संरचना भी सामने आई है।
8. बगदई देवी मंदिर एवं बाँध l Bagadae Devee Mandir & Bandh
9. धमनी l Dhamnee
बलौदा बाज़ार से 30 कि.मी. दूरी पर पूर्व दिशा में इस प्राकृतिक स्थल का आनन्द उठाया जा सकता है। महानदी तट पर वन विश्राम गृह के पास आकर्षक शिव मंदिर एवं दुर्गा मन्दिर का निर्माण किया गया है। यहाँ चारों तरफ सागौन का जंगल है, जहाँ हिरण, जंगली सुअर, तेंदुआ और भालू खास तौर पर गर्मी के दिनों में देखे जा सकते हैं। यहाँ खाने-पीने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। आने वालों को स्वयं सारी व्यवस्था के साथ आना पड़ता है।
10. मावली माता मंदिर, सिंगारपुर l Mavlee Mata Mandir, Singarpur
यह मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 34.8 कि.मी. दूर स्थित है। 16वीं - 7वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर में परम्परानुसार सबसे पहली पूजा गोंड़ राजा करते थे । यह परम्परा आज भी निभायी जा रही है। इस मंदिर में सबसे पहली पूजा गोंड़ राजा के वंशज ही करते हैं। मंदिर की देखभाल व पूजा वीरू नाम का बैगा करता था। इसके बाद इसी बैगा की अगली पीढ़ियां इस जिम्मेदारी को निभाने लगी।
इस मंदिर में जिले अथवा छत्तीसगढ़ राज्य से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग नवरात्र के अवसर पर ज्योति कलश जलाने आते हैं। आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व दाऊ कल्याण सिंह ने यहाँ ज्योति कलश स्थापना की शुरुआत की थी। कई बार मरम्मत होने के कारण मंदिर की मूल संरचना का पता नहीं चलता। तथापि इसकी साज सज्जा भव्य है। परन्तु गर्भगृह सादा है। यह मंदिर विभिन्न सामाजिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र है।
11. मावली माता मंदिर, तरपोंगा l Mavlee Mata Mandir, Tarponga
यह मन्दिर जिला मुख्यालय से लगभग 49 किलोमीटर दूर स्थित सिमगा विकासखण्ड के अधीन ग्राम तरपोंगा गाँव में शिवनाथ नदी के दक्षिण तट पर स्थित है। यहाँ एक प्राचीन ध्वस्त मन्दिर था। ग्रामीणों ने नया मन्दिर निर्माण कर पुरानी द्वार चौखट और मूर्तियों को मण्डप की दीवारों पर जड़ दिया है। यहाँ महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा मावली माता के रूप में पूजित है। मावली माता का यह स्वरूप छत्तीसगढ़ में अत्यधिक प्रसिद्ध है।
इस मन्दिर का प्राचीन द्वार चौखट अलंकृत है। इसकी बायीं द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना अंकित है। दीवार पर जड़ी हुई प्रतिमाओं में चर्तुभुजी विष्णु, महिषासुर-मर्दिनी एवं उमा-महेश्वर आदि महत्वपूर्ण है। इस मन्दिर की द्वार चौखट, मण्डप की प्रतिमाएं एवं वास्तुखण्ड जो मन्दिर सम्मुख पेडेस्टल पर प्रदर्शित किये गये हैं, वे 16वीं - 17वीं शती ईस्वी के हैं। यह छत्तीसगढ़ शासन द्वारा संरक्षित स्मारक है।
12. बल्लार बाँध l Ballar Bandh
जिला मुख्यालय से लगभग 30 कि.मी. दूर कसडोल- असनिंद जंगल मार्ग पर मिरगिदा ग्राम के निकट स्थित इस बाँध का निर्माण बल्लार नाले पर सन् 1980 में किया गया था। यह महानदी बेसिन के अंतर्गत आता है। इसकी ऊँचाई 19.7 मी. एवं लम्बाई 945.12 मी. है। इसका निर्माण सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था। इस बाँध की सिंचाई क्षमता 13750 एकड़ है। यह बांध दो पहाड़ियों को जोड़कर बनाया गया है, जो भाखरा बांध जैसा दृश्य उपस्थित करता है।
वर्तमान में इस बांध से आसपास के 32 गांवों के 6 हज़ार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। इसलिए इसे कसडोल क्षेत्र में जीवनदायिनी माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों से आवश्यकता की पूर्ति न हो पाने के कारण सरकार कैचमेंट एरिया बढ़ाने की योजना पर विचार कर रही है। यहाँ कई जंगली जीव-जंतु पानी पीने के लिए आते हैं, जिन्हें देखने की आस लिए कई पर्यटक पहुँचते हैं।
13. वीर नारायण सिंह स्मारक, सोनाखान l Veer Narayan Singh Smark, Sonakhan
वीर नारायण सिंह का जन्म सन् 1795 में सोनाखान के जमींदार रामसाय के घर हुआ था । वे बिंझवार आदिवासी समुदाय के थे, उनके पिता ने 1818-19 के दौरान अंग्रेजों तथा भोंसले राजाओं के विरुद्ध तलवार उठाई थी, लेकिन कैप्टन मैक्सन ने विद्रोह को दबा दिया। परंतु उनके दबदबे के कारण अंग्रेजों ने उनसे संधि कर ली थी। देशभक्ति और निडरता वीर नारायण सिंह को पिता से विरासत में मिली थी। पिता की मृत्यु के बाद सन् 1830 में वे सोनाखान के जमींदार बने ।
स्वभाव से परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ वीर नारायण जल्द ही लोगों के प्रिय जननायक बन गए। 1854 में अंग्रेजों ने नए ढंग से टकोली लागू की, इसे जनविरोधी बताते हुए वीर नारायण सिंह ने इसका भरसक विरोध किया। इससे रायपुर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर इलियट उनके घोर विरोधी हो गए। सन् 1856 में छत्तीसगढ़ में भयानक सूखा पड़ा था। कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था।
वीर नारायण ने उससे अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने माखन के गोदाम के ताले तुड़वा दिए और अनाज निकाल ग्रामीणों में बंटवा दिया। उनके इस कदम से नाराज़ ब्रिटिश शासन ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 में संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया। सन् 1857 में जब स्वतंत्रता की लड़ाई तेज़ हुई तो छत्तीसगढ़ के लोगों ने जेल में बंद वीर नारायण को ही अपना नेता मान लिया और समर में शामिल हो गए।
उन्होंने अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ बगावत करने की ठान ली थी। नाना साहब द्वारा उसकी सूचना रोटी और कमल के माध्यम से देश भर की सैनिक छावनियों में भेजी जा रही थी। यह सूचना जब रायपुर पहुँची, तो सैनिकों ने कुछ देशभक्त जेलकर्मियों के सहयोग से एक गुप्त सुरंग बनाई और नारायण सिंह को मुक्त करा लिया। जेल से मुक्त होकर वीर नारायण सिंह ने 5 सौ सैनिकों की एक सेना गठित की और 20 अगस्त, 1857 को सोनाखान में स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया।
इलियट ने स्मिथ नामक सेनापति के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना भेज दी। पर नारायण सिंह सोनाखान से अचानक बाहर निकल कर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेजी सेना से भागते भी नहीं बना। पर दुर्भाग्यवश सोनाखान के आसपास के अनेक जमींदार अंग्रेजों से मिल गये। इस कारण नारायण सिंह को पीछे हटकर एक पहाड़ी की शरण में जाना पड़ा। अंग्रेजों ने सोनाखान में घुसकर पूरे नगर को आग लगा दी।
नारायण सिंह में जब तक शक्ति और सामर्थ्य रही, वे छापामार प्रणाली से लड़ते रहे। परंतु अतंत: पकड़े गये। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें । 10 दिसंबर 1857 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सरेआम तोप से उड़ा दिया, इस तरह वे छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद हुए। वीर नारायण को रायपुर में जिस जगह मृत्युदंड दिया गया, आज वहाँ 'जय स्तम्भ' स्थित है। सोनाखान में स्मृतिस्वरूप शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक व संग्रहालय निर्मित है, जहाँ आकर लोग उन्हें याद करते हैं और श्रद्धांजली अर्पित करते है ।
14. सेंट इम्मानुएल चर्च, विश्रामपुर l Center Immanuel Church, Vishrampur
विश्रामपुर स्थित यह छत्तीसगढ़ का पहला चर्च है, इसलिए इसे मदर चर्च भी कहते हैं। इसका निर्माण सन् 29 मार्च 1868 में किया गया था। इसी के साथ छत्तीसगढ़ में पहले मिशनरी केंद्र की स्थापना हुई। घने वृक्षों के बीच स्थित इस चर्च के चारों ओर अब भी अंग्रेजो के पुराने बंगले, प्राथमिक शाला, छापाखाना, गृह उद्योग एवं कचहरी के अवशेष बिखरे पड़े हैं। आज़ादी के कई दशक बाद कचहरी यहाँ से बलौदा बाजार स्थानांतरित कर दी गई। इसके अलावा परिसर के भीतर मसीही के समाज का पुराना कब्रगाह भी है।
इस चर्च के स्थापना की कथा अत्यंत रोचक है। अमेरिका और जर्मनी की इंवेजलिकल सोसायटी ने सन 1867 में पादरी ओटी लोर को भारत का पहला मिशनरी प्रतिनिधि नियुक्त किया। वे अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ 24 अक्टूबर 1867 को सगोमोर जहाज़ से भारत के लिए निकल पड़े। वह
150 दिन के सफ़र के बाद 1 मई 1868 को बम्बई पहुंचे। पादरी ओटी लोर ने बाद में इन पांच महीनो को अपने जीवन का कैद बताया था। बम्बई प्रवास के दौरान उन्होंने नागपुर में एक कांफ्रेंस में सम्मिलित हुए, जिसमें स्कॉटिश मिशन नागपुर के पादरी कूपर ने मिशनरीज को मध्य प्रांत में काम करने का सुझाव दिया। यह बात उन्हें ठीक लगी। वे पुनः अपने परिवार के साथ बैलगाड़ी से 182 मील का सफ़र करते हुए नागपुर से रायपुर पहुंचे।
इसके बाद उन्होंने विश्रामपुर व ढेकुना गाँव में 16 सौ एकड़ भूमि खरीदकर अपना काम शुरू किया। कई महीनों की कठिन यात्रा और थकान के बाद उन्होंने विश्राम किया था, इसलिए इस जगह का नाम विश्रामपुर पड़ गया। यहाँ अपनी सेवा देने वाले विलियम विटकन को इस स्थान से ऐसा स्नेह था कि स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने वसीयत में लिखा कि उन्हें विश्रामपुर में ही दफनाया जाए। कुछ वर्ष पूर्व उनके बच्चों ने उनकी अस्थियाँ लाकर विश्रामपुर चर्च में उनका अंतिम संस्कार किया।
15. राजमहल, बिलाईगढ़ l Rajmahal Bilaigarh
जिला मुख्यालय बलौदा बाज़ार से लगभग 63 कि.मी. की दूरी पर स्थित बिलाईगढ़ जमींदारी का अपना एक इतिहास रहा है, यद्यपि यह काफी बिखरा हुआ है। बिलाईगढ़ से मिले ताम्रपत्रों को प्रमाण मानते हुए इतना अवश्य कहा जा सकता है, कि यह संवत 896 (शासनकाल सन 1135-65 ) में पृथ्वीदेव द्वितीय का और संवत 969 (शासनकाल सन 1198-1222) में कलचुरी शासक प्रतापमल्ल के अधीन था।
यहाँ से ताम्बे के चक्राकार व षटकोणाकार ताम्बे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो प्रतापमल्ल काल के हैं। कलचुरी शासन के पतन के बाद यह संबलपुर रियासत के अधीन आ गया। स्थानीय मान्यता के अनुसार एक बार संबलपुर के राजा ने भैनाओं को पकड़कर गुफा में बंद करवा दिया और आग लगवा दी। भैना लोगों ने धमतरी की बिलाई माता से प्रार्थना की और किसी प्रकार उनकी जान बच गई। भैना दल के प्रमुख मांझी मरवार को
इनामस्वरुप 42 गाँव प्राप्त हुए और इस क्षेत्र का नाम बयालीसगढ़ पड़ गया, जो बाद में बिलाईगढ़ में परिवर्तित हो गया। कुछ समय बाद मध्यप्रदेश के पन्ना में रहने वाले सात भाइयों का दल बिलाईगढ़ पहुंचा और भैना राजाओं को परास्त कर बिलाईगढ़ और कटगी दोनों क्षेत्रों में जमींदारी की स्थापना की। दोनों जमींदारी के अधीन लगभग 284 गाँव थे । यहाँ स्थित राजमहल में आज भी राजपरिवार के वंशज निवास कर रहे हैं।
वर्तमान राजमहल आयताकार है। इसके कुछ हिस्से बनवाने के लिए राजस्थान से कारीगर बुलवाए गए थे। परिसर लगभग 7- 9 एकड़ में फैला हुआ है। बिलाईगढ़ के निकट ही स्थित पहाड़ी पर एक गुफा है, जिसमें इस परिवार की कुलदेवी स्थापति हैं। यहाँ एक रोचक परम्परा है। राजपरिवार की हर पीढ़ी द्वारा मात्र एक बार इस देवी की पूजा की जाती है। एक बार पूजा करने के बाद दुबारा तभी गुफा का द्वार खोला जाता है, जब अगली पीढ़ी का वारिस पैदा हो।
16. बारनवापारा अभयारण्य l Barnavapara Sanctuary
महासमुन्द जिले के कसडोल विकासखण्ड में स्थित यह अभयारण्य जिला मुख्यालय महासमुंद से लगभग 45 किलोमीटर तथा राजधानी रायपुर से 70 कि.मी. दूर रायपुर - सम्बलपुर मार्ग पर स्थित है। इस अभयारण्य का नामकरण यहाँ स्थित ग्राम बारनवापारा पर किया गया है। यह समतल तथा पहाड़ी मिश्रित क्षेत्र 265 से 400 मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सन् 1972 में वन्यजीव अधिनियम के तहत इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया।
यहाँ सूर्यास्त से सूर्योदय तक प्रवेश प्रतिबन्धित रहता है। वन भ्रमण के लिए वन विभाग द्वारा सशुल्क वाहन तथा गाइड उपलब्ध करवाया जाता है। वनग्रामों में पर्यटकों के ठहरने की सुविधा है। इसके अतिरिक्त यहाँ जंगल सफारी की व्यवस्था भी की गई है।
17. तेलीधारा l Teleedhara
यह एक मनोरम स्थल है, जो बारनवापारा से 10 कि.मी. दूर स्थित है। यह स्थान बाँस एवं साल के वन से घिरा हुआ है। यहाँ एक पहाड़ी नदी उँचाई से गिरकर खूबसूरत जलप्रपात बनती है। पर्यटक यहाँ पिकनिक का आनन्द ले सकते है।









