कांकेर का इतिहास, दर्शनी स्थल और पर्यटन स्थल।

कांकेर का इतिहास, दर्शनी स्थल और पर्यटन स्थल।

कांकेर का इतिहास पाषाण युग से शुरू क्षेत्र का होता है। रामायण और महाभारत में दण्डकारण्य नामक घने जंगल युक्त नाम आता है, जिसमें कांकेर भी शामिल था। मिथकों के अनुसार, कांकेर भिक्षुओं और ऋषियों की भूमि थी। ऋषियों का एक समूह जिसमें कंक ऋषि, लोमेश ऋषि, श्रृंगी ऋषि, अंगिरा ऋषि आदि शामिल थे, यहाँ निवास करते थे। प्राचीन काल में कांकेर कौकर्य, कंकण और कंकारय के नाम से जाना जाता था । यह जिला पहाडियो से घिरा हुआ है। यदि हम इसे पर्वतों का नगर कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।>

कांकेर जिला छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी क्षेत्र में तथा बस्तर संभाग के उत्तरी क्षेत्र में स्थित है। यह रायपुर तथा जगदलपुर जैसे अत्यंत विकसित शहरों के बीच बसा है। पहले कांकेर बस्तर जिले का भाग था लेकिन सन् 1998 में इसे स्वतंत्र जिले के रूप में पहचान मिली।महानदी, दूध, हटकुल, सिन्दूर और तुरुर नामक नदियाँ इस जिले के बीच से होकर बहती हैं। वन आच्छादित जिला कांकेर कई अर्थों में विशिष्ट कहा जा सकता है। यहाँ पायी जाने वाली वन सम्पदा इस जिले को समृद्ध बनाती है।>

कांकेर जिले में साल, सागौन और मिश्रित प्रकार के जंगल पाये जाते हैं। साल के जंगल जिले के पूर्वी भाग में, सागौन के भानुप्रतापनगर क्षेत्र में और मिश्रित प्रकार के जंगल ज्यादातर क्षेत्र में पाये जाते हैं, जिनमें नाना प्रकार के औषधीय पौधे और जड़ी-बूटी पाये जाते हैं


    01. राजमहल, कांकेर

    कांकेर स्थित 12 वीं सदी में निर्मित पुराना राजमहल ध्वस्त होने की कगार पर है। इसी महल परिसर के एक हिस्से को विकसित कर नये महल का रूप दिया गया है। तीन शयन कक्षों वाला भवन जो कभी ब्रिटिश प्रशासकीय अधिकारियों का विश्राम गृह हुआ करता था, वर्तमान राज परिवार का निवास स्थान है। यहाँ के शयन कक्ष बड़े और ऊँची छत वाले हैं। इससे जुड़ा हुआ एक प्रसाधन कक्ष है। कमरे स्थानीय शैली से सुसज्जित है। इस महल परिसर से लगकर कुछ कॉटेज बनवाए गए हैं, जिनमें पर्यटकों को आवास व भ्रमण की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं ।



    02. शिवानी मंदिर

    माँ शिवानी मन्दिर कांकेर शहर के निकट स्थित है। देवी शिवानी, काली तथा दुर्गा देवी का सम्मिलित स्वरूप हैं। यह मंदिर क्षेत्रीय निवासियों के लिए आस्था का प्रमुख स्थल है। प्रति वर्ष नवरात्र के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।



    03. प्राचीन बड़े कंकालिन मंदिर

    नगर में स्थित यह मंदिर बड़े कंकालिन मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर में कई प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। परिसर में पत्थर की तलवार, जय-विजय भाइयों का कटा सिर, बेताल तथा सुदर्शन चक्र आदि दर्शनीय है। किंवदंती है, कि जय-विजय नामक दोनों भाई राजा थे। एक युद्ध में दोनों भाइयों के सिर कट गए तथा पत्थर में बदल गए। कटे हुए ये सिर दूध कॉलोनी के पास पड़े थे, जिसे कंकालिन देवी की अनुमति से मंदिर परिसर में लाया गया। जय-विजय की मूर्ति के सामने महिलाओं का जाना वर्जित है ।



    04. प्राचीन शिवालय, सिदेसर

    ग्राम सिदेसर जिला मुख्यालय कांकेर से 8 कि.मी. पूर्व दिशा में स्थित है। इस स्थान पर एक उत्तराभिमुखी शिव मंदिर तथा प्राचीन आश्रम का भग्नावशेष प्राप्त हुआ है। जानकारों के अनुसार शिव मंदिर बौद्धयुगीन है। इस स्थल पर शिव-पार्वती, योद्धा तथा अन्य देवी-देवताओं की खण्डित प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। एक चौड़े प्रस्तर पट्ट पर कुछ अक्षर अंकित है, जिन्हे पढ़ा नहीं जा सका है।

    पास ही स्थित तालाब से मिले अवशेषों में अधिकांश खण्डित प्रतिमाएं हैं। मंदिर के शिखर व कलश का निर्माण निकट ही स्थित पहाड़ी के पत्थरों से किया गया है। परंतु, शिव-पार्वती तथा अन्य प्रतिमाओं का निर्माण अन्य पत्थर से किया गया प्रतीत होता है। इन प्रतिमाओं का शिल्प अत्यंत मनमोहक है। वर्तमान में यहाँ ग्रामीण पूजा अर्चना करते हैं। श्रावण माह तथा शिवरात्रि में इस स्थान पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है।



    05. भुकुरादेव, सिदेसर

    प्राचीन शिवालय के सामने खुले भाग में भुकुर्रादेव के नाम से प्रचलित दो पाषाण खण्ड है। बस्तर अंचल में बग्गधरा देव का विवरण मिलता है। संभवत: बग्गधरा देव ही यहाँ भुकुर्रादेव के नाम से पूजित है। स्थानीय निवासी विधि विधान से भुकुर्रादेव की पूजा करते हैं। इस स्थल पर जेठवनी (दीपावली) त्योहार में गायों के गले में पहनाये जाने वाले सोहई चढ़ाया जाता है। यह कार्य गाँव के बरदिहा (राउत) द्वारा सम्पन्न किया जाता है।



    06. शिव मंदिर, रिसेवाड़ा

    सिदेसर से कुछ ही किलामीटर की दूरी पर रिसेवाड़ा ग्राम स्थित है। रिसेवाड़ा के निकट स्थित शिव मंदिर में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। सामने नंदी की कलात्मक प्रतिमा स्थित है। यह प्रतिमा भग्न है, जिसे ग्रामीणों ने सीमेंट से जोड़कर ठीक करने की कोशिश की है। इस प्रयास में नंदी का मुख विकृत होकर पहचानने योग्य भी नही रहा।

    मंदिर के ठीक सामने अवस्थित भैरवी की युद्धरत प्रतिमा में भी सुधार का प्रयत्न किया गया और उनका मुख नए सिरे से सीमेंट से बना दिया गया। मंदिर के प्रवेशद्वार के दोनों तरफ गणेश प्रतिमाएं स्थापित हैं तथा ठीक सामने देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के सामने एक वृक्ष पर बहुत पुरानी लोहे की एक जंजीर बंधी हुई है, जो समय बीतने के साथ तने के भीतर घुस गई है।

    अब जंजीर की कुछ कड़ियाँ ही बाहर नज़र आती हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह जंजीर गांव का भाग्य लेकर बंधी है, यदि किसी ने इसे खोल दिया तो अनिष्ट की आशंका है। मंदिर के निकट ही एक प्राचीन तालाब है, जिसके बारे में स्थानीय निवासियों की मान्यता है, कि यहाँ देवी-देवता स्नान करने आते हैं। मंदिर के सामने लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर एक पहाड़ी है। उस पहाड़ी के मध्य भाग में एक देवी प्रतिमा है।

    इस स्थल पर कुछ स्थापित नियमों के अनुपालन के पश्चात ही जाया जा सकता है। स्थानीय नागरिक इस स्थल पर जाने से एक सप्ताह पूर्व से ही आचरण-व्यवहार में शुद्धता रखने का यत्न करने लगते हैं। यहाँ तक स्थानीय निवासियों के सहयोग से ही पहुँचा जा सकता है।



    07. रिसेदेवी मंदिर, रिसेवाड़ा

    रिसेवाड़ा में एक प्राकृतिक गुफा को रिसेदेवी का स्थान माना जाता है। बस्तर में रिसेदेवी दंतेश्वरी देवी की छोटी बहन मानी जाती हैं। मान्यता है, कि दोनों बहनों में किसी बात पर झगड़ा हो गया और छोटी बहन रूठकर यहाँ चली आई। इसलिए देवी का नाम रिसेदेवी पड़ा। रिसेदेवी की गुफा में प्रवेश करने के बाद वहाँ तिलक भभूत लगा हुआ एक छोटा सा प्रस्तर खण्ड नज़र आता है, इस प्रस्तर पर कोई आकृति उत्कीर्ण नहीं है। आसपास मिट्टी के घोड़े, दीपक तथा अनेक कुम्हार निर्मित मूर्तियां रखी हुई है।



    08. मलांजकुडुम झरना

    यह झरना कांकेर से 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं। पर्वत पर स्थित नीली गोंडी नामक स्थान से दूध नदी निकलती है। वहां से 10 कि.मी. की दूरी पर मलांजकुडुम नामक स्थान पर इस नदी से क्रमश: 10, 15, तथा 9 मीटर की ऊँचाई के झरने बनते हैं। चट्टानों से टकराकर नीचे गिरती हुई जलधारा सुन्दर सीढ़ीदार जलप्रपात का निर्माण करती हैं ।



    09. ढुटमुहिन देवी मंदिर, अंजनी

    जिला मुख्यालय कांकेर से 15 कि.मी. दूर ग्राम अंजनी में स्थित है ढुटमुहिन देवी मंदिर। ग्राम के नाम के आधार पर इन्हें अंजनी देवी भी कहते हैं। वनों से आच्छादित एकांत व शांत वातावरण में स्थापित इस मंदिर में भूईफोर देवी की पूजा होती है, जो 12 परगनों की देवी मानी जाती हैं।

    इस मंदिर के बारे में जनश्रुति है, कि ग्राम अंजनी से 6 कि.मी. दूर स्थित ग्राम ठेमा के जंगल में ठेमा नामक एक सिद्ध पुरूष तंत्र साधना करता था। वह जाति का गोण्ड था। उसी जंगल में एक ब्राम्हण कन्या तंत्र साधना के लिए आई। ठेमा तथा उस ब्राम्हण कन्या ने विवाह कर लिया और साथ-साथ तंत्र साधना करने लगे। इनके दो बच्चे बाल बाबू तथा बाल कुँवर हुए।

    विवाह के बाद ठेमा और ब्राम्हण कन्या आपस में खान- पान तथा तंत्र साधना को लेकर लड़ने लगे। एक दिन यह लड़ाई ज्यादा बढ़ गई। ठेमा कुल्हाड़ी लेकर ब्राम्हण कन्या को मारने दौड़ा। वह अपने बच्चों को लेकर पास के गांव पाटौद के डोगरी में छुप गई। कुछ समय बाद वह ग्राम अंजनी में तंत्र साधना करने लगी। इस घटना के काफी समय बाद अंजनी ग्राम की कुछ महिलाएं जब इसी जंगल में कंद खोद रही थीं, तभी अचानक उनकी कुदाल किसी चीज से टकराई।

    जब उस स्थान को खोदा गया तो वहाँ एक ढुटी के आकार का पत्थर मिला। ढुटी मछली रखने की टोकरी को कहते हैं, जो बांस की पतली सींकों से बनाया जाता है। इस पत्थर के एक ओर देवी और दूसरी तरफ अन्य किसी की मूर्ति थी। लोगों ने पत्थर निकालने की अथक कोशिश की लेकिन नहीं निकाल सके। ग्रामीणें ने प्रतिमा को उस ब्राम्हाण कन्या का प्रतिरूप मानकर अंजनी देवी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

    ढुटमुहिन देवी के भुईफोर स्थल पर आकाश-पाताल मंदिर का निर्माण किया गया। यानि, यह मंदिर तीन तरफ से खुला है। ऊपर कलश वाले भाग पर तीन छिद्र हैं। मान्यता है, कि इन छिद्रों के द्वारा देवी का आकाश से सम्पर्क रहता है। बारिश के मौसम में पानी की बूंदें देवी के ऊपर गिरती हैं।

    इस मंदिर में देवी प्रतिमा के साथ ही दो नन्हीं मूर्तियाँ भी स्थापित हैं, जिन्हें देवी की संतानें बाल बाबू तथा बाल कुँवर कहा जाता है, जबकि एक अन्य मूर्ति को लमसेना का माना जाता है। वह ठेमा डोकरा का भांजा भी माना जाता है। इस मंदिर में लोग सभी प्रकार की मन्नत मांगने आते हैं।



    10. शैलचित्र, चंदेली तथा गोटीटोला

    जिला मुख्यालय कांकेर से लगभग 27 किलोमीटर दूर स्थित चारामा की पहाड़ियां अनोखे शैलचित्र के लिए प्रसिद्ध हैं। चंदेली में शीतला माता नामक स्थान पर पीले एवं लाल रंग निर्मित मानवाकृतियाँ, धनुषधारी और विशिष्ट शिरोभूषायुक्त त्रिशूलधारी मानव का अंकन हैं।

    कई लोग इन्हें 'अन्तरिक्ष प्राणी' का चित्रण मानते हैं क्योंकि इनमें धड़ छोटा और सिर तुलनात्मक रूप से बड़ा है। कहीं-कहीं इन्हें विचित्र पोशाक में भी दर्शाया गया है, जिसे लोग स्पेस सूट मानते हैं । इस तरह की आकृतियाँ चंदेली से लेकर गोटीटोला तक फैली हुई हैं। इन्हें लगभग 10 हज़ार वर्ष पुराना बताया जाता है।

    ये शैलचित्र प्राकृतिक रंगों से बनाए गए हैं। स्थानीय निवासी इनकी पूजा करते हैं। इन चित्रों के बारे में कहानियाँ भी प्रचलित है, जिसके अनुसार पुराने ज़माने में छोटे कद के लोग उड़न तश्तरी में बैठकर आते थे और गांव से लोगों का अपहरण कर लेते थे और वह व्यक्ति फिर कभी लौटकर नहीं आता था। लेकिन पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के विशेषज्ञ इस धारणा का खण्डन करते हैं। गोटीटोला के जोगड़ा नामक स्थान पर पक्षी, हथेली और पगचिह्नों का लाल एवं गेरुए रंग का अंकन मिलता है।



    11. चारामा के अन्य शैलचित्र

    खैरखेड़ा : कांकेर और चारामा के बीच स्थित लखनपुरी के पास खेरखेड़ा ग्राम पंचायत है, जिसके दक्षिण की ओर से बाहर निकलने पर एक कच्ची पगडण्डी है, जिस पर एक-डेढ़ किलोमीटर आगे चलने पर 2-3 छोटे टीले दिखते हैं, इनमें से छोटे वाले टीले के बिलकुल नीचे एक बड़ी चट्टान के निचले भाग में कुछ शैलचित्र बने हुये हैं। इस स्थान को स्थानीय ग्रामीण 'भलेओ राव' के नाम से बुलाते हैं।

    इन चित्रों में हाथ और पैरों (तलवे) के चिन्ह, शिकार के लिए धनुष लिए मानव, झोपड़ी इत्यादि शामिल हैं। इसके अलावा ऊद्लाव सदृश पशु आकृतियाँ एवं 'कप मार्क्स भी मिलते हैं। खैरखेड़ा में ही चाँदपखरा नामक स्थान पर शिकारी मानव, हथेली और पगचिन्ह, चंद्राकृति एवं उड़ते हुए पक्षियों का अंकन है।

    उड़कुड़ाः चारामा तहसील के ग्राम उड़कुड़ा में मेगालिथिक अवशेष तथा लघु अश्मोपकरण के साथ शैलचित्र भी प्राप्त होते हैं। यहाँ दो स्थानों पर चित्रित शैलाश्रय है। इनमें जोगीबाबा का स्थान, ठाकुरपारा व कचहरी से ज्ञात शैलचित्रों में हथेली, पैरों के चिन्ह, पशुओं का अंकन व धनुर्धारी प्रमुख है। यहाँ जोगीबाबा गुफा में जोड़ा हिरण, जटिल रेखांकन और स्त्रियों के समूह का अंकन है एवं ठाकुरपारा नामक स्थान पर पशु, हथेली (स्टेंसिल) और परिधानयुक्त मानव आकृतियाँ चित्रित हैं।

    कुलगाँव: कांकेर से 12 कि.मी. दूर स्थित कुलगाँव की पहाड़ी श्रंखला मे चित्रित शैलाश्रय स्थित है। यहाँ पशु, कछुआ, मछली एवं दंडाकार लघु मानव आकृतियाँ चित्रित हैं। इन्हें सिंगार पाथर कहा जाता है। कान्हागाँव: कांकेर से पश्चिम में देवरी मार्ग पर 20 कि.मी. की दूरी पर पीढ़ापाल के समीप चित्रित शैलाश्रय है। यहाँ मानवाकृतियाँ व पशुओं के चित्र अंकित है।



    12. गाड़ागौरी पहाड़ी

    चरामा विकासखंड के लखनपुरी ग्राम में स्थित गाड़ागौरी पहाड़ी पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। इस पहाड़ी के नीचे चट्टानों पर एकसमान माप वाले कई मानव निर्मित छिद्र हैं। इसके उत्तर में सीधी कतार में इसी तरह की कई संरचनाएं हैं। जानकारों के अनुसार आदिमानव इन संरचनाओं के जरिये सूर्योदय-सूर्यास्त, मौसम एवं समय की गणना किया करते थे। तकनीकी भाषा में इन्हें 'कप मार्क्स' कहा जाता है। पहाड़ी के ऊपर कामाख्या मंदिर की भाँति एक पत्थर पर योनि आकृति बनी हुई है।

    स्थानीय निवासी इसे देवी सती का खंडित अंग मानकर पूजा करते हैं। यहीं गढ़शीतला नामक स्थान पर कुछ धुंधले शैलचित्र बने हुए हैं। इनमें ज्यादातर पशु आकृतियों के साथ-साथ विशेष शिरोभूषा वाली मानव आकृतियों का अंकन है। स्थानीय निवासी इन शैलचित्रों को खून का दाग मानते हैं।

    इसी पहाड़ी पर 12 फ़ीट गहरा एक कुआं है, जो देवकुंड के नाम से जाना जाता है। भीषण गर्मी में भी यह कुंड सूखता नहीं है। इसके अलावा इस पहाड़ी पहाड़ी के नीचे वर्ष में सिर्फ एक बार फागुन में खिलने वाला 'पांचफूल' भी पाया जाता है।



    13. लोक देवी रानी माई

    चारामा तहसील के रानी डोंगरी ग्राम पंचायत के अंतर्गत स्थित हल्बा टिकरापारा गाँव से लगभग 3 कि.मी. दूर घने जंगल के बीच स्थित पहाड़ी पर लोक देवी रानी माई का मंदिर विराजमान है, जो कि आसपास के 7-8 गाँवों की प्रमुख देवी मानी जाती हैं।

    यहाँ विशाल चट्टानों वाली छोटी पहाड़ी है। देवी स्थान तक पहुंचने के लिए छोटी-छोटी पैड़ियाँ(सीढ़ियाँ) बना दी गई हैं। सीढ़ियाँ जहाँ समाप्त होती है, वहाँ लगभग 50 फ़ीट की ऊँचाई वाला एक विशाल एकाश्म चट्टान है, जिसके ऊपर एक अन्य विशाल चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रूप से खड़ी है।

    यह खुला स्थान ही देवी रानी माई का स्थान माना जाता है। यहाँ इनकी कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। देवी स्थान के पुजारी (बैगा) का मानना है, कि देवी अंदर गुफा में विराजित हैं। एकाश्म चट्टान ऊँचाई पर जाकर फट गई है, इसलिए गुफा का द्वार बंद हो गया है। पोला त्योहार के अवसर पर लोग यहाँ मिट्टी का बैल चढ़ावे में चढ़ाते हैं। इस मंदिर का प्रसाद बाहर नहीं ले जाया जाता, बल्कि यहीं खा लिया जाता है । यहाँ महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

    स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस क्षेत्र में रानी माई महानदी तथा बावन कोरी देवताओं के साथ बस्तर से आईं हैं। उन्होंने इस डोंगरी (पहाड़ी) को अपने योग्य समझ अपना डेरा जमा लिया। इसके बाद देवी रानी माई का समस्त परिवार यहां आकर रहने लगा।



    14. शिव मंदिर, करप

    कांकेर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित करप गाँव में यह मंदिर अवस्थित है। इसके ठीक सामने तालाब तथा पीछे की ओर मुख्य सड़क है। मंदिर लगभग 6 मीटर की ऊँचाई लिये हुए है एवं मुख्य द्वार पर शीर्ष में एक गणेश प्रतिमा उकेरी गयी है। यह मंदिर वैसे तो धराशायी होने की कगार पर है, लेकिन इसके पीछे एक विशाल वृक्ष ने इसे थाम रखा है।

    यह मंदिर कांकेर के सोमवंशी शासक कर्णराज (1184-1206 ई.) द्वारा निर्मित है। उनके पिता बोपदेव ने अपने दोनों पुत्रों कर्णराज तथा सोमराज के बीच संघर्ष को टालने के लिये शासन के दो भाग कर दिये थे। कर्णराज के हिस्से कांकेर, धरमतराई तथा सिहावा का क्षेत्र आया तथा सोमराज के हिस्से तहंकापार, चारामा और गुरूर का क्षेत्र आया।

    कर्णराज ने करप के अलावा सिहावा में पाँच शिव मंदिरों तथा कांकेर में दूध नदी के किनारे विशाल रामनाथ शिव मंदिर का निर्माण भी करवाया था ।



    15. इंदू केवट की समाधि, दुर्गूकोंदल

    इन्द्र केवट की कहानी वर्तमान बस्तर संभाग के उत्तरी क्षेत्र से जुड़ी है जो कभी कांकेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। दुर्गूकोंदल के निवासी इन्द्र केवट ने महात्मा गाँधी के सत्याग्रही मार्ग को जीवन में उतार लिया तथा वे इस आदिवासी अंचल में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के सूत्रधार

    साधारण सी धोती और हाथ में डण्डा लिए वे गाँव-गाँव घूमते तथा गाँधी के आदर्शो व स्वतंत्रता की आवश्यकता जैसी बातों से ग्रामीणों को परिचित कराया करते थे। बात वर्ष-1933 की है, जब महात्मा गाँधी दुर्ग आये हुए थे। इन्द्र केवट गाँधी जी से मिलने के लिए नंगे पांव अपनी लाठी टेकते हुए पैदल ही दुर्गूकोंदल से दुर्ग तक निकल पड़े।

    गाँधी जी उनके समर्पण भाव तथा ओजस्विता को देख कर अत्यधिक प्रभावित हुए थे। गाँधी जी से हुई इस मुलाकात के बाद इन्दू केवट बस्तर के गाँव-गाँव घूम कर आदिवासी समाज को स्वतंत्रता के मायने समझाने लगे। इन्दू केवट के कारण ही कांकेर रियासत ने राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ जाना और तिरंगे से परिचित हुए।

    वर्ष 1944-45 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों को धन, लकड़ी, अनाज आदि की आवश्यकता पड़ी, तो बस्तर और कांकेर की जनता मुख्य रूप से उनके द्वारा शोषित हुईं। वर्ष 1945 में नयी भू-राजस्व व्यवस्था के तहत अनेक गांवों को जोड़ा गया और हंटर के बल पर किसानों से उनकी फसल छीनी जाने लगी।

    इन्द्रू केवट ने तब 'लगान मत पटाओ' का नारा दिया और राजा तथा अंग्रेजों के विरोध में जुट गये परिणामस्वरूप इन्द्रू केवट और उनके 429 किसान साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। दुर्गूकोंदल गांव में आज भी उनकी समाधि देखी जा सकती है। इस गांव में उनके पोते रहते हैं, जो बड़े गर्व से उनकी कहानी सुनाते हैं। गाँव के बाहर नदी के किनारे इन्द्रू केवट का आदिवासी परम्परा के अनुरूप बनाया गया स्मारक अभी ठीक ठाक हालत में नदी के किनारे अवस्थित है।