नारायणपुर जिले की स्थापना मई 2007 में हुई । इस जिले में लगभग 70 प्रतिशत आदिवासी निवास करते हैं। यह जिला प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है। यह चारों ओर से घने वनाच्छादित पहाड़ों से घिरा हुआ है । यहाँ के जलप्रपात, प्राकृतिक गुफाएं आदि दर्शनीय है। यह मुख्य रूप से नारायणपुर तथा ओरछा दो विकासखंडों में विभाजित हैं। जिला मुख्यालय नारायणपुर है।
रावघाट लौह अयस्क खदान का आधा हिस्सा कांकेर जिले में तथा आधा हिस्सा नारायणपुर जिले में पड़ता है। रावघाट की पहाड़ियों में लौह अयस्क के छः ब्लॉक हैं, जिनमें 712.48 मिलियन टन लौह अयस्क होने का अनुमान है। हालाँकि बरसों से इस परियोजना पर काफ़ी चर्चा हो रही है, तथापि अभी तक यहाँ काम शुरू नहीं हुआ है।
1. अबूझमाड़
छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ संसार के सबसे रहस्यमय स्थानों में से एक है। इसका वास्तविक आकार एक अबूझ पहेली है। यह बस्तर के जंगल से लेकर आंध्रप्रदेश, तेलंगाना के आदिलाबाद, खम्मम और पूर्वी गोदावरी जिलों, महाराष्ट्र के चंद्रपुर और गढ़चिरौली से लेकर मध्यप्रदेश के बालाघाट और ओड़िसा के मलकानगिरी तक फैला है। करीब 4400 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ के जंगलों, पहाड़ों और गहरी घाटियों के बीच बसे गुमनाम गांवों का भू-सर्वेक्षण कभी नहीं हो पाया।
असल में जीपीएस और गूगल मैप के इस दौर में भी अबूझमाड़ में कुल कितने गांवों में किसके पास कितनी ज़मीन है, चारागाह या सड़कें हैं या नहीं या जीवन की दूसरी ज़रूरी चीजों की उपलब्धता कैसी है, इसका कोई रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है। ये गांव कहां हैं या इनकी सरहद कहां है, यह भी पता नहीं है।
इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है, कि बस्तर के चार हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले हुए नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ में पहली बार अकबर के ज़माने में राजस्व के दस्तावेज़ एकत्र करने की कोशिश की गई थी। लेकिन घने जंगलों वाले इस इलाके में सर्वे का काम अधूरा रह गया। भारत के पहले महासर्वेक्षक एडवर्ड एवरेस्ट भी वर्ष 1872 से 1880 के बीच अबूझमाड़ की समस्त स्थलाकृति का आकलन कराने में नाकाम रहे थे।
80 के दशक में माओवादियों ने इस इलाके में प्रवेश किया और फिर इसे अपना आधार इलाका बनाना शुरू किया। वही दौर था, जब अबूझमाड़ के इलाके में प्रवेश के लिये कलेक्टर से अनुमति लेने का नियम बना दिया गया। प्रवेश के इस प्रतिबंध को कई सालों बाद वर्ष 2009 में ख़त्म किया गया। हालाँकि सन् 2017 में छत्तीसगढ़ सरकार को आंशिक कामयाबी मिली और संभावित 237 गांवों में से 10 का हवाई सर्वे किया जा सका है, जिसमें नारायणपुर के 190, बीजापुर के 39, दंतेवाड़ा जिले के 8 ग्राम शामिल हैं।
यहाँ आज भी आदिमयुगीन सभ्यता जीवित है। अबूझमाड़िया या माड़िया आदिवासियों के गांव अधिकतर नदियों के किनारे अथवा पहाड़ी ढलानों पर पाए जाते हैं। पहाड़ियों की ऊँचाई धरा से 1007 मीटर तक हैं, 14 पहाड़ियों की चोटियाँ 9 सौ मीटर से अधिक ऊँची हैं। पर्वतों को वे कोट, कोटि या पेप कहते हैं, जैसे धोबी कोटी, कंदर कोटी, क्या कोटी और राघोमेट दूसरी ओर बड़ी नदियों के नाम क्षेत्र के मानचित्रों में मिल जाते हैं, पर छोटी नदियाँ गुमनाम हैं। यहाँ कुछ छोटी नदियों के नाम हैं।
कोरा मुण्डा, ओर मुण्डा, ताल्सि मुण्डा इत्यादि । अबूझमाड़ियों ने अपनी बोली में इन छोटी से छोटी नदियों को कुछ न कुछ नाम दे रखे हैं और सभी नामों के पीछे नदी सूचक शब्द मुण्डा जुड़ा रहता है। प्रत्येक घर के चारों ओर एक बाड़ी होती है, जिसमें केला, सब्जी और तम्बाकू उगाई जाती है। इनके खेत ढलवा भूमि में होते हैं जिनमें धान उगाया जाता है। जंगली क्षेत्रों को साफ करते समय यह ध्यान रखा जाता है, कि क्षेत्र में बांस अधिकता से न पाए जाते हों, क्योंकि बांसों के पुनः अंकुरित होने का खतरा रहता है।
अबूझमाड़िया स्थानांतरी कृषि करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को साधारणतः अपनी आवश्यकता की भूमि प्राप्त हो जाती है। जंगलों में कृषि की भूमि का चुनाव करते समय गांव का मुखिया यह निर्णय देता है, कि किस व्यक्ति को कितनी भूमि चाहिए और वह कहाँ होगी। जंगल सफाई का काम सामूहिक रूप से किया जाता है। खेतों में अलग-अलग बाड़ नहीं बनाई जाती है वरन् पूरे (पेंडा) को घेर लिया जाता है।
भले ही वह 2 सौ या 3 सौ एकड़ का हो। यह 'बाड़ा' अत्यधिक मजबूत बनाया जाता है। यहाँ के जंगलों में केवल सूअर ही इन बाड़ों में घुसने का प्रयत्न करते है जिनसे रखवाली करने के लिए मचान बनाए जाते हैं। धान के अतिरिक्त चमेली, गटका, कसरा, जोधरा इत्यादि मोटे अनाज उगाए जाते हैं, जिन्हें जंगली सूअरों से विशेष नुकसान पहुँचता है। अबूझमाड़ का बाइसन हॉर्न' नृत्य प्रसिद्ध है, जिसमें अबूझमाड़ी गाय या भैंस के सींग वाली टोपी लगाकर नाचते हैं।
गांव पहाड़ियों की चोटियों पर बसाए जाते हैं। कोशिश की जाती है कि, तीन ओर से पर्वत हो और एक ओर से नदी। साधारणतः प्रमुख गाँवों का बाहरी हिस्सा 'मड' या बाज़ार के काम में लाया जाता है। इन बाज़ारों में निश्चित ग्रामों से अबूझमाड़ी आते हैं। दूसरे शब्दों में ये 'मड' एक सुनिश्चित आर्थिक प्रभाव क्षेत्र को बतलाते हैं
2. करसाड़ जात्रा
करसाड़ जात्रा का आयोजन अबूझमाड़ क्षेत्र के कोकोड़ी गाँव में तथा इसके आसपास के इलाकों में किया जाता है। कोण्डागाँव में इसे ककसाड़ कहा जाता है। यूं तो यह आयोजन इस क्षेत्र के अन्य गावों में भी किया जाता है, लेकिन कोकोड़ी गाँव में धूमधाम ज़यादा होती है।
इस अवसर पर करंगाल परगना के 45 गाँव के आदिवासी तीन दिवसीय त्योहार करसाड़ मनाने के लिए एकत्रित होते हैं। करसाड़ का अर्थ देवक्रीड़ा होता है, जिसे देवता खेलाना कहते हैं। करसाड़ को गोण्डी भाषा में 'करसी हियाना' कहा जाता है। करसाड़, हल्बा एवं गोण्ड दो आदिवासी जातियों के सम्मिलन एवं समरसता का पर्व है। प्रचिलित जनश्रुति के अनुसार, बूढ़ा देव के भाई का नाम हाड़े हिड़मा है, जिन्हें कोकोड़ी करिया भी कहा जाता है।
उन्होंने मावली देवी की पुत्री राजटेका से प्रेम विवाह किया था । मावली माता हल्बा जनजाति की देवी हैं और बूढ़ा देव गोण्ड जनजाति के देवता हैं। बूढ़ा देव के भाई हाड़े हिड़मा (कोकोड़ी करिया) एवं मावली देवी की बेटी राजटेका (राजेश्वरी) के विवाह द्वारा हल्बा एवं गोण्ड जनजाति का मिलन हुआ, इसलिए करसाड़ को दोनों जनजाति के लोग मिल-जुलकर मनाते हैं।
इस तीन दिवसीय पर्व के पहले दिन करंगाल परगना के सभी देव कोकोड़ी पहुँचते हैं, जिनमें हाड़े हिरमा के समुदाय के स्त्री-पुरुष और बच्चे होते हैं। यहाँ पहुँचने पर पुरोहित देव मांझी उनका स्वागत करते हैं तथा ढोल बजाए जाते हैं। उसके बाद महिलाओं को एक पंक्ति में और पुरुषों को एक पंक्ति में बिठाया जाता है।
रात को सामूहिक भोज होता है तथा अगले दिन जात्रा संयोजकों की तरफ से सबको एक समय पकाने-खाने के लिए चावल-दाल दिया जाता है। अगले दिन सुबह हाड़े हिड़मा एवं राजटेका ग्राम भ्रमण पर जाते हैं, हर घर के लोग इनका तेल एवं हल्दी लगाकर स्वागत करते हैं। ग्राम भ्रमण के पश्चात इनको यात्रा स्थल पर लाया जाता है। फिर नगाड़ों की ध्वनि से देवता खेलाने का कार्य प्रारम्भ हो जाता है।
वृक्षों के नीचे आराम कर रहे सभी लोग आयोजन स्थल पर पहुँच जाते हैं। महिलाएं नृत्य करती हैं एवं युवा ढोल बजाते हुए थिरकते हैं तथा इनके बीच देवता खेलते हैं। सिरहों पर देवताओं की सवारी आ जाती है। यह दौर देर रात तक चलता है। उसके पश्चात अगले दिन सुबह देवता तालाब में स्नान करते हैं एवं उनकी इच्छा के अनुरुप मुर्गे, बकरे, सूअर आदि की बलि दी जाती है। इसी स्थान पर बलि पकाई खाई जाती है। मंडादेव से नारायणपुर की मावली मड़ई की तिथि प्राप्त कर सांझ तक सभी देवता अपने-अपने स्थान को रवाना हो जाते हैं तथा जात्रा सपन्न हो जाती है।
3. माता मावली मेला
नारायणपुर माता मावली मेला विश्व प्रसिद्ध है। इसका आयोजन फरवरी माह में किया जाता है। मेले की परम्परा 8 सौ वर्षों से भी पुरानी है। जनश्रुति के अनुसार सन् 1300 के पूर्वार्ध में आंध्र प्रदेश के वारंगल रियासत के पांडुवंशी राजा रूद्रप्रताप देव बस्तर के नागवंशी शासक को पराजित कर बस्तर के शासक बने । उन्होंने ही क्षेत्र में कई मंदिरों की स्थापना के साथ इस मेले की भी शुरुआत की थी।
मावली मेला आरम्भ होने से कुछ दिन पहले सभी परगनों के देवी-देवताओं को पधारने के लिए आमन्त्रण भेजा जाता है। पहली रात देव उतारना पूजा होती है। इस दिन मावली माता व शीतला माता के लिए पवित्र काजल बनाया जाता है। मेले के दिन दोपहर तक सभी देवी- देवताओं के पदार्पण के बाद बुधवारी बाज़ार तक दो बार परिक्रमा होती है। पुनः मेला स्थल पर रुककर एक उल्टी परिक्रमा के बाद सभी देवी-देवताओं की विदाई होती है।
4. गोटुल
गोटुल ऐसा सांस्कृतिक केंद्र कहा जा सकता है जहाँ मुरिया- माड़िया समुदाय के युवा भावी जीवन के लिए प्रशिक्षित होते हैं। गोटुल आम तौर पर गाँव के एक छोर पर कभी-कभी मध्य में निर्मित हुआ करता है। गोटुल की संरचना में तीन मुख्य भाग होते हैं। पहला आँगन का भाग, जिसके बीचों बीच लकड़ी का खंभा गड़ा होता है और समूची जगह नाचने गाने के लिये खुली हुई होती है।
दूसरा 'परछी' वाला हिस्सा जहाँ अलाव जलाया जाता है, आम तौर पर यहीं समूहों में बैठ कर 'प्रेमी युवक-चेलिक' और 'युवती प्रेमिकाएं- मोटियारियां' आपस में परिचित होते हैं: किस्से कहानियाँ गढ़ते, कहते और सुनते हैं; या सुख-दुख बाँटते हैं। गोटुल की 'परछी' और 'कमरों' की दीवारें लकड़ी, बाँस के खूंटे और बाड़ीनुमा ढाँचे को बनाकर, फिर उनमें मिट्टी छापकर तैयार की जाती है। इस तरह बनी दीवारों को चूने या 'छुई मिट्टी' से लीप दिया जाता है।
छत लकड़ी की मजबूत बीम पर टिका हुआ और खपरैल, घास-फूस या सागवान के पत्तों से ढँका होता है। इसी छत पर गोटुल के सदस्य अपने हथियार, फरसा, टंगिया, हँसिया, खंता, कुल्हाड़ी, सब्बल, टोकनी, सूपा, टुकना आदि चीजें भी रखते हैं। गोटुल गाँव की सम्पत्ति होता है - गाँव की परिधि से बाहर बना सामाजिक-सांस्कृतिक केन्द्र। गोटुल में आपसी संवाद, किस्से कहानियों, विमर्श, नृत्य-गीत आदि का सिलसिला तब तक चलता है, जब तक कि चाँद और 'सात तारे या कि ग्वालझुमका' सिर पर नहीं आ जाते।
जब यह सभा विसर्जित होती है तो कम आयु के चेलिक और मोटियारियाँ अलग-अलग हो कर परछी में ही, अथवा बड़े से हॉलनुमा कमरे में, जो कि गोटुल का ही तीसरा हिस्सा होता है, वहाँ जा कर सो जाते हैं। यह भी होता है कि एक दूसरे के हो चुके चेलक और मोटियारियाँ आधी रात के बाद अपनी-अपनी गीकी में बँध जाते हैं। गीकी वह चटाई होती है, जो खजूर या ताड़ के पत्तो से गूंथ कर गोटुल की मुटियारी, बड़े ही जतन से अपने चेलिक के लिये बनाती है।
बड़े कमरे के एक हिस्से में केवल वे चेलिक और मोटियारियाँ ही साथ-साथ सोते हैं जिनका प्रेम, बंधनों की परिभाषा से आजाद हो गया हो। यहाँ उन्हें एक होने की स्वाधीनता है। गोटुल एक सामाजिक संस्था है, जिसमें समुचित कार्य विभाजन है। झरिया, गोटुल की सफाई करता है, लकड़ियाँ इकठ्ठी करता है, रात होने पर आग जलाता है। मुसवान गोटुल की साज-सज्जा का कार्य सम्पन्न करते हैं, जिसमें दीवालों की लिपाई-पुताई, भित्तिचित्र आदि रचना सम्मिलित है।
उनके कार्य में रानियाँ हाथ बटाती हैं। रानी वस्तुत: गोटुल में लड़कियों को दिया जाने वाला एक पद है और इसके साथ निर्वहित किये जाने वाले दायित्व हैं गोटुल के भित्तिचित्र बनाना, दोने तैयार करना आदि। चेलिक गोटुल सदस्यों को तम्बाकू बाँटता है तो बैद उपचार करने, प्रेत बाधा आदि दूर करने के लिये नियत होता है। गोटुल एक व्यवस्था के तहत कार्य करता है। अत: कई पद भी निर्धारित किये गये हैं।
और उनके संचालन से लेकर दण्डित करने तक की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है। पदनाम भी राज-व्यवस्था से बहुत हद तक प्रभावित हैं जैसे दीवान, जिसका कार्य सदस्यों की निगरानी करना और उन्हें दण्डित करना है; कोटवार, जिसका कार्य घोटुल में सदस्यों की उपस्थिति और अनुपस्थिति को जाँचना है। लगभग आठ वर्ष की आयु के पश्चात विवाह होने तक सभी लड़के-लड़कियों को गोटुल आना अनिवार्य होता है, अनुपस्थित रहने पर वे दण्ड के भागी होते हैं।
अस्वस्थ सदस्य अथवा मासिक धर्म के समय ही युवतियों को गोटुल न आने की छूट होती है; सिपाही, जिनका कार्य गश्त लगाना, सुरक्षा प्रदान करना आदि है। गोटुल तो सारगुतियों की चुहल से ही आबाद होता है। सारगुतियाँ वस्तुतः सहेलियों के लिये प्रयुक्त होने वाला शब्द है जो सम्बोधन गोटल में आने वाली हर लड़की के लिये नियत किया गया है। चेलिक और मोटियारियाँ क्रमश: प्रेमी-प्रेमिका के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले शब्द हैं, ये घोटुल संस्था की आत्मा हैं। गोटुल में सदस्यों को नाम भी दिए जाते हैं, जिन्हें गोपनीय रखा जाता है।
5. गौर नृत्य
जनसंख्या की दृष्टि से बस्तर अंचल में माड़िया व मुरिया सबसे अधिक हैं। यही कारण है, कि वहां के सभी आदिवासियों के लिए सामान्यजन मुरिया-माड़िया शब्द का प्रयोग करते हैं। पहाड़ को बस्तर में माड़ कहा जाता है। माड़ में रहने के कारण यह जनजाति माड़िया कहलाती है। दूसरी और गोंडी भाषा में माड़ा का अर्थ वृक्ष होता है। वृक्ष वाले अर्थात माड़ा क्षेत्र में रहने के कारण भी इन्हें माड़िया कहा गया।' गौर' या ' गंवर' नृत्य करते समय माड़िया पुरुष नर्तक अपने सिर पर गौर के सींग वाला मुकुट धारण करते हैं, इसलिए यह नृत्य गौर नृत्य कहलाता है।
प्रायः अविवाहित माड़िया युवक-युवतियां इसमें भाग लेते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से वैवाहिक समारोहों में किया जाता है। बस्तर के शहरी व्यापारी भी विवाह अवसरों पर मुंहमांगी कीमत देकर माड़िया नर्तकों को बुलाते हैं। गौर को माड़िया बोली में माओ या पेटमा कहा जाता है। आदिवासियों के लिए इनके सींग दुर्लभ होते हैं, इसलिए जिसे यह सींग नहीं मिलता, वह जंगली भैंसों के सींग से काम चलाता है। बाँस की खपच्ची को बीच में रख कर उस पर दोनों सींग लगा कर कपड़े से बांधकर उसे मजबूती दी जाती है।
बाँस के आगे की तरफ सींग पीछे की तरफ मोर और मुर्गे के पंख लगाये जाते हैं। सींग मुकुट के आगे कौड़ियों को गूंथकर उसकी बहुत सारी लड़ी बनाकर लगाते हैं, इससे पहनने वाले का चेहरा नहीं दिखता। मुकुट में पीछे की तरफ कपड़ा लटकता रहता है।
दण्डामि माड़िया बहुत मेहनत तथा रुचि से इस सींग वाले मुकुट को बनाते हैं। एक माड़िया गौर के सींग को पाने के लिये एक बैल तक दे सकता है, बस उसे ऐसा सही सींग मिलना चाहिये जो नीचे से उजला और ऊपर से काला हो। सींग ही नहीं इस मुकुट में लगने वाले एक एक पंख भी चुन-चुन कर, ध्यान से लगाया जाता है। नाचते समय अगर मुकुट से पंख गिर गया तो उसे ठीक नहीं माना जाता। इस शिरोभूषण को माड़िया समाज में संपत्ति की मान्यता प्राप्त है और वह पुत्र को उत्तराधिकार में यह सौंपा जाता है। पुत्र के न होने पर भतीजे का अधिकार मान्य हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त नृतत्वशास्त्री वेरियर एल्विन ने बाइसन हॉर्न माड़िया नृत्य को भारत का सुन्दरतम नृत्य निरुपित किया है। यह एक जोशीला नृत्य होता है, जिसमें महिला नर्तकों के हाथ तिरहुड्डी यानि लोहे की 5-6 फ़ीट लंबाई वाली छड़ होती है। इस छड़ के ऊपरी सिरे पर लोहे की फलियां गुंथी होती हैं। जमीन पर पटके जाने पर ये फलियाँ आपस में टकरा कर छन्न की आवाज़ करती हैं।
गौर नृत्य के लिए युवतियां भी सजती हैं। वे सर पर पीतल की लगभग चार इंच चौड़ी पट्टी पहनती हैं, जो 'कुड्ड' कहलाती है। संपन्न माड़िये सोने की पट्टी पहनते थे। नाक में नथ, कान में कर्णफूल, कंठीमाला, सूता, हाथों में अंगूठियां (महेल) गले में माला (रुपया) पहनती हैं। पुरुष नर्तक मांदर लटकाए होते हैं। यह वजनी मांदर 90 से.मी. की लंबाई और सौ से.मी. गोलाई वाला होता है।
किंवदंती है, कि एक बार बड़े पैमाने पर आदिवासियों ने गौर का शिकार किया, जिसका बदला लेने गौर समूह ने आदिवासियों पर आक्रमण कर सैकड़ों लोगों को मार डाला। इसके बाद माड़ियों ने गौर से दोस्ती करने का निश्चय किया। गौर का शिकार बंद कर दिया गया और उसका सींग धारण कर उन्होंने गौर समूह को विश्वास दिलाया, कि वे उनके सगे हैं। गौर समूह ने भी इसे स्वीकार किया। एक अन्य धारणा के अनुसार, माड़ियों ने भगवान शंकर के अनुचरों को सींग धारण कर सामूहिक नृत्य करते देखा और भगवान से सींग मांगा। शंकर जी ने उन्हें वरदान स्वरूप अपने सिर पर धारण किया सींग दे दिया।
इस प्रकार से अनादिकाल से गौर नृत्य की परंपरा का अभिज्ञान होता है। गौर के शिकार वाली घटना के पक्ष में यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है, कि आज भी इस नृत्य के दौरान गौर के चालों की नकल उतारी जाती है। चलने का ढंग, आक्रमण की मुद्रा आदि भाव, मुद्राओं का समावेश नृत्य में रहता है। नारायणपुर के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मंडई में चार-पांच सौ माड़िया युवक-युवतियों को सामूहिक रूप से एक साथ नाचते देखना अनिर्वचनीय आनंद देने वाला होता है। दो-ढाई सौ मांदरों के एक साथ बजने से सम्पूर्ण वातावरण अपने आप ऊर्जावान बन जाता है ।
6. चंदेरू पर्यावरण पार्क
जिला मुख्यालय के निकट स्थित गाँव गढ़बेंगाल में बस्तर टाइगर नाम से पहचाने जाने वाले स्व. चेंदरु की स्मृति में चेंदरु पर्यावरण उद्यान विकसित किया गया है। यह उद्यान लगभग 6 एकड़ में फैला हुआ है। इसके निर्माण में 1.8 करोड़ की लागत आई थी। उद्यान के मुख्य द्वार पर बस्तर संस्कृति की झलक देखी जा सकती है। साल 1957 में ऑस्कर अवार्ड विजेता आर्ने सक्सडॉर्फ ने स्वीडिश में 'एन द जंगल सागा' नाम से फिल्म बनाई थी, जिसे अंग्रेज़ी में 'दि फ्लूट एंड दि एरो' नाम से जारी किया गया था।
इस फिल्म में गढ़बंगाल गाँव के 10 साल के चेंदरू ने बाघों और तेंदुओं के साथ काम किया था। उस समय आर्ने सक्सडॉर्फ ने लगभग दो साल तक बस्तर में रह कर पूरी फिल्म की शूटिंग की थी। फिल्म में लगभग 10 बाघ और आधा दर्जन तेंदुओं का उपयोग किया गया था। फिल्म में दिखाया गया था कि किस तरह चेंदरू का दोस्त गिंजो एक मानवभक्षी तेंदुए को मारते हुए खुद मारा गया और उसके बाद चेंदरू की किस तरह बाघ और तेंदुओं से दोस्ती हो गई।
गढ़बेंगाल गांव से कभी बाहर नहीं गए चेंदरू फिल्म की वजह से महीनों विदेशों में रहे। विदेश से वापस गांव आने के बाद फिर उनके सामने ज़मीनी सच्चाई थी। समय के साथ चेंदरू नारायणपुर और बस्तर के जंगल में गुम होते चले गए। सन् 2013 में लम्बी बीमारी से जूझते हुए उनकी मौत हो गई।
7. रामकृष्ण आश्रम
अबूझमाड़ क्षेत्र में स्वामी आत्मानंद द्वारा रामकृष्ण आश्रम की स्थापना सन् 1985 में की गई। इस आश्रम का मुख्य उद्देश्य अबूझमाड़ क्षेत्र के निर्धन अदिवासियों के हित में काम करना है। यहाँ निवास करने वाले प्रायः सभी आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले हैं। स्वामी आत्मानंद का मानना था, कि आदिवासियों का भोलापन ही उनके शोषण का मुख्य कारण है। वे उनके लिए कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे वे स्वतंत्र रूप से जीवन यापन कर सकें। इसके लिए आश्रम द्वारा तीन स्तरों पर कार्य प्रारम्भ किया गया।
शिक्षा के लिए सन् 1989 में विवेकानंद पीठ की स्थापना की गई। यह विद्यापीठ आदिवासी लड़कों के लिए निःशुल्क आवासीय विद्यालय है। यहाँ बच्चों के लिए आवास युक्त शिक्षा की उच्चस्तरीय व्यवस्था है। मुख्य रूप से अस्थायी आवास अथवा झोपड़ेनुमा असुरक्षित आवास में निवास करने के कारण छात्र अपना प्रमाणपत्र विद्यालय में ही रखते हैं, आवश्यकता पड़ने पर ले जाते हैं तथा पुन: विद्यालय में ही जमा कर देते हैं।
बालिका शिक्षा हेतु माँ शारदा पीठ की स्थापना: रामकृष्ण आश्रम चूंकि बेलूर से संचालित होता है, जहाँ केवल पुरूषों के विकास के लिए कार्य किया जाता है, इसलिए रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत बालिकाओं के लिए विद्यालय खोलना असम्भव था। इस समस्या के निवारण के लिए एक अलग समिति की स्थापना हुई। मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 के तहत एक अलग संस्था के रूप में अप्रैल 1989 को विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल हेल्प, वेलफेयर एंड सर्विस पंजीकृत करवायी गई। इस संस्था के अधीन माँ शारदा विद्यापीठ, नारायणपुर तथा माँ शारदा विद्यापीठ ओरछा (अबूझमाड़) का संचालन किया जाता है।
कृषि के विकास के लिए विवेकानंद युवा प्रशिक्षण केन्द्र तथा कृषि प्रदर्शन सह-प्रशिक्षण कार्य: इस बिन्दु पर कार्य करने के लिए आदिवासियों को कृषि सम्बंधित प्रशिक्षण तथा उत्पाद को बाज़ार तक पहुँचाने के लिए जानकारी उपलब्ध करवायी जाने लगी। जल्द ही रामकृष्ण आश्रम ने अबूझमाड़िया आदिवासियों का दिल जीत लिया। बाहरी दुनिया के प्रति उदासीन आदिवासियों के मन में आज भी इस आश्रम के प्रति अगाध विश्वास है। शोधकार्य तथा अध्ययन के लिए आने वाले दल रामकृष्ण आश्रम के सहयोग से ही इनके साथ सम्पर्क स्थापित कर पाते हैं।
08 छोटा डोंगर
नारायणपुर से लगभग 50 कि.मी. दूर ओरछा मार्ग पर स्थित एक छोटा सा गाँव है। यहाँ शिव मंदिर का अवशेष नई तराई तालाब के निकट एक आयताकार चबूतरे के ऊपर मौजूद है। इसे देखकर प्रतीत होता है, कि यह मंदिर पूर्वाभिमुखी रहा होगा। वर्तमान में यहाँ सिर्फ आयताकार गर्भगृह के अवशेष ही मौजूद हैं। इस मंदिर से लगभग 2 सौ मीटर दूर रामसागर तालाब के किनारे दो गोलाकार शिवलिंगयुक्त जलहरियों के साथ एक चौकोर जलहरी भी रखी हुई हैं।
अनुमान लगाया जा सकता है, कि ये सभी प्रतिमाएं मूल मंदिर का हिस्सा रहा होगा। स्थापत्य कला एवं प्रतिमा लक्षण के आधार पर इस मंदिर का निर्माण काल 13वीं शताब्दी के मध्य का माना जाता है। यहाँ से एक शिलालेख भी मिला है जो वर्तमान में जगदलपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। छोटे डोंगर आज़ादी की लड़ाई के दौरान 'आदिवासी विद्रोह' का भी साक्षी रहा है। 1 फरवरी 1910 में क्रांतिकारियों ने विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए बस्तर क्षेत्र के एक-एक घर को सन्देश के रूप में लाल मिर्च, मिट्टी के ढेले, तीर-धनुष, भाले और आम की डालियाँ भेजी। धीरे-धीरे हज़ारों लोग एकजुट हो गए। छोटे डोंगर में आयतू महरा के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रजों के खिलाफ संघर्ष किया और सुप्रीम कमांडर गेयर ने पंजाबी सेना के बल पर इस विद्रोह का दमन कर दिया था।
09. जलप्रपात, हांदावाड़ा
यह जलप्रपात धार्मिक नगरी बारसूर से 30 कि.मी. दूर पश्चिम दिशा में अबूझमाड़ के घने जंगलो के बीच हांदावाड़ा में धारा डोंगरी पहाड़ी पर स्थित है, जो नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखण्ड में आता है । यह खूबसूरत जलप्रपात हांदावाड़ा के घने व निर्जन पहाड़ पर इन्द्रावती की सहायक गोंयदर नदी द्वारा निर्मित है। यहाँ लगभग 50 से 70 मीटर की ऊँचाई से 120 अंश का कोण बनाते हुए जलधारा चट्टानों से टकराकर कई धाराओं में विभक्त होती हुई नीचे गिरती है। इस विशाल जलप्रपात का वास्तविक स्वरूप बारिश के मौसम में नज़र आता है। यह जलप्रपात जितना ख़ूबसूरत है उतना ही कठिन है यहाँ तक पहुँच पाना। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में स्थित होने के कारण आवागमन के लिए अब तक कोई मार्ग नहीं बन पाया है। फिर भी प्रकृति प्रेमी कुछ पर्यटक अपने निजी साधनों से यहाँ तक पहुँच ही जाते हैं।
10. जलप्रपात, कच्चापाल
बस्तर संभाग के सुदूर क्षेत्रों में कई छिपे हुए दर्शनीय स्थल हैं, जिनके बारे में दुनिया को पता ही नहीं है। यह जलप्रपात जिला मुख्यालय से लगभग 47 कि.मी. दूर कच्चापाल गाँव से 4 कि.मी. की दूरी पर ऊँची-ऊंची पहाड़ियों व घनघोर जंगल के बीच स्थित है। यह बस्तर क्षेत्र के अल्पज्ञात स्थलों में से एक है। यहाँ एक पहाड़ी नाला लगभग 80 फ़ीट की ऊँचाई से गिरता है।
यह खूबसूरत मगर गुमनाम जलप्रपात वर्ष 2019 में पर्यटन के शौक़ीन एक जोशीले पत्रकार बापी राय और उनके सहयोगी रौनक शिवहरे के द्वारा प्रकाश में लाया गया। कच्चापाल गाँव से जलप्रपात तक पहुँच मार्ग न होने के कारण लगभग 4 कि.मी. का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। इस क्षेत्र में बाहरी लोगों का आवागमन बहुत कम होने के कारण यह अब तक दुनिया की नज़रों से ओझल रहा है। वर्तमान में यहाँ आने से पूर्व पुलिस और सीआरपीएफ़ से मशविरा कर लेनी चाहिए।
11. चर्रे-मर्रे जलप्रपात
नारायणपुर के अंतागढ़-आमाबेड़ा वनमार्ग पर पिंजारिन घाटी में यह जलप्रपात जोगीधारा नदी स्थित है। यह संकरी घाटी उत्तर, पूर्व और दक्षिण में ऊँची- ऊंची पहाड़ियों से और पश्चिम में संरक्षित वन से घिरा हुआ है। खुरसेल घाटी प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण होने के साथ-साथ अनेक वन्य जीवों का ठिकाना भी है। यही वजह है, कि इसे देश के चुनिन्दा सुन्दर स्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ के जंगल में कई औषधीय पौधे जैसे क्लोरोक्सिलीन एवं वेंटिलोगो आदि पाए जाते हैं। जंगल में पाए जाने वाले जीव- जन्तुओ में भेडकी, चार सींग वाले मृग, बाइसन, ब्लैकबक, आदि प्रमुख हैं। यहीं से होकर खुरसेल नदी गुजरती है जिसके नाम पर यह घाटी भी जानी जाती है।
नारायणपुर तहसील की इसी घाटी क्षेत्र में गुड़ाबेला नामक स्थल से 9 कि.मी. दूर घने जंगल के बीच खुर्सेल नदी द्वारा निर्मित लगभग 4 सौ फीट ऊँचा और कई खंडों में बंटा एक खूबसूरत जलप्रपात स्थित है। यहाँ एक तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं तो दूसरी तरफ तीखी पहाड़ी ढलान पर फिसलकर गिरती हुई जलधारा स्वप्नलोक जैसा दृश्य निर्मित करती है।
12. शिल्पग्राम सेवाग्राम, नारायणपुर
कोंडागांव, नारायणपुर व जगदलपुर टेराकोटा कला के लिए प्रसिद्ध है। जगदलपुर कोसा सिल्क बुनाई के लिए प्रसिद्ध है। बेल मेटल व रॉट आयरन की कारीगरी कोंडागांव और जगदलपुर की विशेषता है। लकड़ी और बांस का सर्वश्रेष्ठ कार्य नारायणपुर व जगदलपुर में देखा जा सकता है। बस्तर की सबसे पुरानी हस्तकलाओं में स्मृतिचिन्ह के रूप में प्रयोग किए जाने वाले नक्काशीदार पत्थर भी शामिल हैं।
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए नारायणपुर में शिल्पग्राम सेवाग्राम की स्थापना छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास मंडल द्वारा सन् 1993 में की गई थी। इसका मकसद सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इस अंचल के हस्तशिल्प को बढ़ाना था, साथ ही नक्सलवाद से प्रभावित स्थानीय लोगों को आजीविका का साधन उपलब्ध करवाना भी था। वर्तमान में शिल्पकारों के 40 से भी अधिक परिवार यहाँ रहते हैं, जबकि 5 सौ शिल्पकार इस केंद्र के लिए काम करते हैं।
बांस शिल्प इस केंद्र की विशेषता है, लेकिन लोहा, पत्थर, मिट्टी, लकड़ी और शंख- सीपियों पर भी यहाँ कलात्मक काम होता है। शिल्पग्राम में स्थानीय लोगों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं, जिनमें दूसरे राज्यों के सिद्धहस्त शिल्पकारों को प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रित किया जाता है। अबूझमाड़ क्षेत्र से लगभग साढ़े 3 हज़ार लोगों को बांस शिल्प का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। शिल्पग्राम के अनेक कलाकार दिल्ली हाट, सूरजकुंड, नागपुर, शिमला, रांची, तिरूअनंतपुरम इत्यादि स्थानों में आयोजित शिल्प मेलों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।
इनमें से कुछ तो स्विट्जरलैंड, फ्रांस, इग्लैण्ड, इटली तथा अमेरिका में भी अपनी कलाकृतियां प्रदर्शित कर चुके हैं। इस अंचल के पंडीराम मंडावी, जयराम मंडावी, बेलगुर मंडावी आदि कई सिद्धहस्त शिल्पियों ने पुरस्कृत होकर अपनी अलग पहचान स्थापित की है।